Of Nida Fazli, David Foster Wallace and Occam’s Razor.

David_Foster_Wallace

बहुत साल हमारे प्रिय मित्र Vijay (जो के दीनानाथ चौहान हाइन नहीं है) ने निदा फ़ाज़ली साहब का एक शेर सुनाया था. बड़ा ही ज़बरदस्त शेर है.

के कुछ तबियत मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत न हुई, 
जिस को चाहा उसे अपना न सके जो मिला उस से मोहब्बत न हुई.

अभी करीब आधे घंटे पहले, लेखक Mayank Tewari के पसंदिता राइटर David Foster Wallace का लिखा, कुछ पढ़ा.

“I tend to be interested in women that I turn out not to get along very well with. And the ones that I get along very well with, I’m not interested in in a kind of romantic way. So that I’ve got a lot of really good women friends. But I tend to have a really hard time with girlfriends, because the ones I’m attracted to are a lot of fun you know for, in the standard ways, for like a couple of weeks. But in terms of the daily, let’s-go-shopping stuff, that we tend not to get along really well.” (from “Although Of Course You End Up Becoming Yourself: A Road Trip with David Foster Wallace” by David Lipsky)

जो फ़ाज़ली साहब ने दो पंक्तियों में कहा, वही कहने में David Foster Wallace ने छे-सात पंक्तियाँ लगा दी.

अगर आज की सोच लगायी जाये, तो कौन किस से इंस्पायर हुआ होगा? क्या फ़ाज़ली साहब मुंबई की बरसाती रातों में David Foster Wallace को पढ़ते थे?

या David Foster Wallace ने देवनागिरी/उर्दू सीख रखी थी?

दोनों ही इस दुनिया से कूच कर चुकें हैं, इस लिए इस सवाल का जवाब दे पाना मुश्किल है.

पर अगर कांस्पीरेसी थ्योरी से दूर रहे है और Occam’s Razor लगाया जाए, तो शायद दोनों को ये काफी सिमिलर सा ख्याल, अलग अलग ही आया होगा.

अब आप सोचेंगे के ये मैंने क्यों लिखा? तो कभी कभी बैठे बैठे खाली खुरापाती दिमाग में बस ऐसे ही ख्याल आते हैं.

 

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